बचपन की कितनी ही यादें ताज़ा हो जाती हैं जब आप वोह कुछ पुराने नगमे सुनते है। ऐसा लगता है जैसे पता नहीं कौनसी बचपन की भूली भिसरी यादों मैं खो जाते हैं हम। एक ऐसा ही नगमा अचानक मुझे अपने बचपन के दिनों मैं ले गया और फिर जाने कितने ही समय के लिए मनन उन गलियारों मैं भटकता रहा और लौटकर आने का नाम ही नहीं ले रहा था। मेरी पैदाइश सन १९८२ की है। जिन दिनों मैं अपने किशोरवय से गुजर रही थी, उन दिनों हिंदी सिनेमा में जूही चावला, पूजा भट्ट, आमिर खान, रवीना टंडन, करिश्मा कपूर, शाहरुख़ खान आदि नामी गिरामी हस्तियों का बोलबाला था। बचपन में कभी भी सिनेमा देखने में मेरी रूचि नहीं थी, बल्कि उन दिनों मैं विविध भारती ही बड़े आनंद से सुना करती थी। मुझे बचपन से ही संगीत से लगाव रहा है। सिनेमा के बजाय संगीत सुनाने में अधिक आनंद आता था। गद्य और पद्य में हमेशा हइ मैंने कवितओं और गजलों को चुना है। ऐसा नहीं है की उपन्यास में रूचि नहीं थी, किन्तु पद्य की कुछ ही पंक्तियों में वोह जादू था कि कुछ ही पंक्तियों में मन का कोई कोना भीग जाता था। वैसे इतनी भूमिका बाँधने कि जरूरत नहीं थी। बस यह कहेने के लिए कि मेरा एक बहुत ही पसंदीदा गीत था "नवरंग " का "आधा है चन्द्रमा रात आधी "। काई वर्षों तक तो बस यह गाना विविध भारती पर सुनती थी और कभी देखने कि हिमाकत ही ना हुई, कि कहीं बेहूदा चित्रीकरण देखकर मन उदास हो गया तब? एक दिन रंगोली में यह गाना देखा और आश्चर्य की सीमा ना रही। जब श्री व्ही शांताराम का अनोखा गाना देखा तब मन मोहित हो गया।
जब आज के दौर में अनेक द्विअर्थी संवादों और गानों का बोलबाला सिनेमा में भरपूर है, तो ऐसे साफ़ प्रेमगीतों की कमी खलती है। http://www.youtube.com/watch?v=8Ni0ryO4V_E
जब आज के दौर में अनेक द्विअर्थी संवादों और गानों का बोलबाला सिनेमा में भरपूर है, तो ऐसे साफ़ प्रेमगीतों की कमी खलती है। http://www.youtube.com/watch?v=8Ni0ryO4V_E

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